13 Jun 2026 Patna
Hello
Hello
Hello
NATIONAL

बक्सर में मिली 300 वर्ष पुरानी दुर्लभ पांडुलिपियां, संत कवि दरियादास की विरासत पर नया प्रकाश

ज्ञान भारतम मिशन के तहत मिला महत्वपूर्ण दस्तावेजी खजाना, शोधकर्ताओं में उत्साह

Admin 12 Jun 2026, 09:21 AM 21 views
बक्सर में मिली 300 वर्ष पुरानी दुर्लभ पांडुलिपियां, संत कवि दरियादास की विरासत पर नया प्रकाश

बक्सर | DB Nation News

भारत सरकार के ज्ञान भारतम मिशन के अंतर्गत भारतीय ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और दुर्लभ पांडुलिपियों के संरक्षण की दिशा में बक्सर से एक महत्वपूर्ण उपलब्धि सामने आई है। जिले के निवासी लक्ष्मीकांत मुकुल के पैतृक पारिवारिक संग्रह से संत कवि दरियादास की संतमत एवं भक्ति परंपरा से संबंधित तीन अत्यंत दुर्लभ हस्तलिखित पोथियां प्राप्त हुई हैं, जिन्हें भारतीय सांस्कृतिक धरोहर की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

Hello

जानकारी के अनुसार ये पांडुलिपियां वर्षों से परिवार के संरक्षण में सुरक्षित थीं। लक्ष्मीकांत मुकुल ने इसकी जानकारी उप विकास आयुक्त बक्सर एवं जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी को दी, जिसके बाद इन दुर्लभ दस्तावेजों के अध्ययन और संरक्षण की प्रक्रिया शुरू हुई।

विशेषज्ञों द्वारा किए गए प्रारंभिक अवलोकन के आधार पर अनुमान लगाया जा रहा है कि इन पांडुलिपियों का निर्माण लगभग 300 वर्ष पूर्व हुआ होगा। यदि यह अनुमान आगे के शोध में प्रमाणित होता है, तो यह खोज संत साहित्य, लोकभाषा, भारतीय ज्ञान परंपरा और उत्तर भारत की आध्यात्मिक विरासत के अध्ययन में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।

कैथी लिपि और लोकभाषा की अनमोल धरोहर

Hello

प्राप्त तीनों पोथियां हाथ से तैयार किए गए मोटे देशी कागज पर लिखी गई हैं। इनमें प्राकृतिक स्रोतों से निर्मित स्याही का उपयोग किया गया है तथा लेखन कैथी लिपि में किया गया है। इनकी भाषा भोजपुरी मिश्रित अवधी है, जो उस समय की सामाजिक, सांस्कृतिक और भाषाई संरचना को समझने का महत्वपूर्ण आधार प्रस्तुत करती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि पांडुलिपियों की लेखन शैली और संरक्षण की स्थिति यह संकेत देती है कि इन्हें केवल धार्मिक पाठ के रूप में नहीं, बल्कि अध्ययन, साधना और ज्ञान के संरक्षण के उद्देश्य से अत्यंत सावधानीपूर्वक तैयार किया गया था।

तीन दुर्लभ ग्रंथों में छिपा है आध्यात्मिक चिंतन

प्राप्त पांडुलिपियों में पहली पोथी ‘सतनाम स्तुति’ से संबंधित है, जिसमें संतमत की मूल अवधारणाओं, नाम-स्मरण और निर्गुण भक्ति का विस्तृत वर्णन मिलता है।

दूसरी पांडुलिपि ‘प्रेम मूला’ है, जिसे संत कवि दरियादास की महत्वपूर्ण रचनाओं में गिना जाता है। इस ग्रंथ में प्रेम को आध्यात्मिक साधना का मूल आधार बताते हुए आत्मबोध और भक्ति के गूढ़ पक्षों की व्याख्या की गई है।

तीसरी पांडुलिपि विशेष रूप से उल्लेखनीय मानी जा रही है क्योंकि इसमें भक्ति धारा और संतमत परंपरा के समन्वय का प्रयास दिखाई देता है। विद्वानों का मानना है कि यह ग्रंथ उस दौर के आध्यात्मिक और वैचारिक विमर्श को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

शोध और संरक्षण के लिए खुलेंगे नए द्वार

इतिहासकारों और शोधकर्ताओं का मानना है कि इन पांडुलिपियों का महत्व केवल उनकी प्राचीनता में नहीं, बल्कि उनमें संरक्षित ज्ञान और वैचारिक परंपरा में भी निहित है। संत कवि दरियादास ने बिहार और पूर्वांचल के लोकजीवन में निर्गुण भक्ति, सामाजिक समरसता और आध्यात्मिक समानता के विचारों को जन-जन तक पहुंचाया था।

उनकी अनेक रचनाएं आज भी निजी संग्रहों और अप्रकाशित रूप में मौजूद हैं। ऐसे में इन दुर्लभ हस्तलिखित पोथियों की प्राप्ति संत साहित्य, भाषा विज्ञान, इतिहास और भारतीय ज्ञान परंपरा के शोधकर्ताओं के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोल सकती है।

सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम

विशेषज्ञों का मानना है कि इन पांडुलिपियों का वैज्ञानिक संरक्षण, डिजिटलीकरण और गहन अध्ययन किया जाना आवश्यक है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भारतीय ज्ञान परंपरा की इस अमूल्य धरोहर से परिचित हो सकें।

बक्सर से सामने आई यह खोज न केवल जिले बल्कि पूरे बिहार की सांस्कृतिक और साहित्यिक विरासत के लिए गौरव का विषय बन गई है।

DB Nation News Desk

Share:

Follow Us Live

Facebook

Instagram

YouTube